सपा-कांग्रेस गठबंधन में सीटों पर पहली रार, कांग्रेस ने ठोका 150 सीटों पर दावा; अखिलेश के सामने नई चुनौती
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछने से पहले ही विपक्षी गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान सतह पर आ गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस ने अपनी शुरुआती दावेदारी सार्वजनिक कर दी है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा है कि पार्टी राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 150 से कम सीटों पर किसी भी सूरत में चुनाव नहीं लड़ेगी।
गौतम ने कांग्रेस को गठबंधन में 50 प्रतिशत सीटों का हकदार बताते हुए यह भी कहा कि पार्टी के पास सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए सक्षम उम्मीदवार मौजूद हैं। सीट बंटवारे की पूरी प्रक्रिया अक्टूबर में पूरी होने की उम्मीद जताई गई है।
403 सीटों का गणित और सपा का पेच
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। यदि कांग्रेस की न्यूनतम 150 सीटों की मांग मान ली जाए, तो बाकी 253 सीटें बचती हैं। समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह है कि ये बची हुई सीटें केवल उसके अपने उम्मीदवारों के लिए नहीं होंगी। अखिलेश यादव को अपने दूसरे सहयोगी दलों और संभावित नए साथियों के लिए भी इसी कोटे से सीटें निकालनी होंगी।
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा 111 सीटें जीतकर राज्य में मुख्य विपक्षी दल बनी थी, जबकि कांग्रेस केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। ऐसे में 150 सीटों की मांग सीट-बंटवारे की बातचीत को जटिल बना सकती है।
2024 का रिपोर्ट कार्ड बनाम 2017 का कड़वा अनुभव
सीटों के इस दावे के पीछे कांग्रेस का मुख्य आधार 2024 का लोकसभा चुनाव है।
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2024 के आम चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर प्रदेश की 80 में से 43 लोकसभा सीटें जीती थीं (सपा को 37 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं), जिससे बीजेपी 33 सीटों पर सिमट गई थी।
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कांग्रेस ने रायबरेली, अमेठी, सहारनपुर, सीतापुर, इलाहाबाद और बाराबंकी जैसी सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसी प्रदर्शन के दम पर कांग्रेस खुद को सिर्फ छोटी सहयोगी के रूप में सीमित रखने को तैयार नहीं है।
दूसरी तरफ, सपा के सामने 2017 के विधानसभा चुनाव का इतिहास है। उस समय ‘यूपी के लड़के’ नारे के साथ दोनों दल साथ आए थे। कांग्रेस 114 सीटों पर लड़ी थी लेकिन केवल 7 सीटें जीत सकी थी, और सपा सत्ता से बाहर हो गई थी। इसी वजह से सपा का रुख सीटों की कुल संख्या के बजाय ‘सीट जीतने की क्षमता’ (Winnability) को आधार बनाने पर रहेगा।
PDA समीकरण और जीतने लायक सीटों की जंग
अखिलेश यादव 2027 के चुनाव में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी ‘PDA’ फॉर्मूले को अपना मुख्य सामाजिक आधार बनाकर आगे बढ़ रहे हैं। कांग्रेस को अधिक सीटें जाने की स्थिति में सपा के पास अपने सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के तहत टिकट बांटने की जगह कम हो जाएगी।
इसके अलावा, असल खींचतान सिर्फ संख्या को लेकर नहीं बल्कि मजबूत सीटों के चयन को लेकर भी होगी। कांग्रेस पश्चिमी यूपी के सहारनपुर, अपने पुराने प्रभाव वाले रायबरेली-अमेठी क्षेत्र, बुंदेलखंड और पूर्वांचल की कुछ प्रमुख सीटों पर दावा मजबूत कर सकती है, जहां सपा के भी अपने मजबूत स्थानीय दावेदार मौजूद हैं।
अक्टूबर में समझौते की उम्मीद
सीटों की संभावित संख्या को लेकर इससे पहले 25 सितंबर की रिपोर्टों में कांग्रेस की मांग 125 से 135 सीटों के बीच आंकी जा रही थी, जबकि सपा सहयोगियों के लिए करीब 65 सीटें छोड़ने का विचार कर रही थी। अब प्रदेश प्रभारी के सार्वजनिक बयान ने बातचीत का दायरा बढ़ा दिया है।
हाल ही में दोनों दलों के नेताओं के बीच बयानबाजी बढ़ने पर शीर्ष नेतृत्व की ओर से संयम बरतने की सलाह भी दी गई थी। अंतिम समझौते की रूपरेखा राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच सीधी बातचीत के बाद ही तय होगी।
