UNSC Expansion: स्थायी सदस्यता की जंग, 3 दशक बाद भी क्यों अटका है भारत का दावा?
वैश्विक मंच पर भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, लेकिन दुनिया की सबसे शक्तिशाली संस्था मानी जाने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का ढांचा आज भी दशकों पुराने ढर्रे पर टिका हुआ है। भारत 1990 के दशक से लगातार सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है। इसके बावजूद सदस्य देशों के बीच नए स्ट्रक्चर और विस्तार के नियमों पर आम सहमति न बन पाने के कारण यह मामला अब भी अधर में लटका हुआ है।
क्या है UNSC का मौजूदा ढांचा?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य देश होते हैं। इस व्यवस्था को दो श्रेणियों में बांटा गया है:
-
स्थायी सदस्य (P5): इसमें पांच देश शामिल हैं—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। इन सभी पांचों देशों के पास ‘वीटो पावर’ (Veto Power) है, यानी इनमें से किसी एक देश के विरोध करने पर भी कोई प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता।
-
अस्थायी सदस्य: बाकी 10 देशों को क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। इनके पास वोटिंग का अधिकार तो होता है, लेकिन वीटो की शक्ति नहीं होती।
तीन दशकों से भारत की दावेदारी और G4 का गठन
विश्व की सबसे बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक शांति अभियानों में बड़े योगदान के आधार पर भारत 1990 के दशक से ही सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की मांग कर रहा है।
इस प्रक्रिया को औपचारिक गति तब मिली जब 2008 में संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद सुधारों पर औपचारिक अंतर-सरकारी वार्ता (Intergovernmental Negotiations) शुरू हुई। इसके बाद, साल 2010 में भारत ने ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर ‘G4’ (Group of Four) समूह बनाया। इन चारों देशों ने एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन करते हुए वैश्विक स्तर पर सुधारों के लिए दबाव बनाना शुरू किया।
कहां फंसा है सुधारों का पेंच?
तमाम प्रयासों और वैश्विक समर्थन के बावजूद सुरक्षा परिषद के विस्तार में कई बड़ी अड़चनें सामने आ रही हैं:
-
वीटो पावर पर मतभेद: मुख्य विवाद इस बात पर है कि नए स्थायी सदस्यों को वीटो पावर दी जाए या नहीं। वर्तमान P5 देश अपने विशेष अधिकारों को साझा करने में हिचकिचाते रहे हैं।
-
क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: G4 के प्रत्येक देश के खिलाफ उनके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों ने ‘कॉफी क्लब’ (Uniting for Consensus) जैसा समूह बना रखा है, जो स्थायी सीटों के विस्तार का विरोध करता है।
-
आम सहमति का अभाव: संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन के साथ-साथ सभी पांच स्थायी सदस्यों की मंजूरी अनिवार्य है, जिस पर अभी तक कोई सर्वसम्मत फॉर्मूला तैयार नहीं हो सका है।
भारत का स्पष्ट रुख है कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित किए बिना और विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व दिए बिना संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रासंगिकता और प्रभावशीलता बनाए नहीं रख सकता।
