October 5, 2026

जानिए ‘कौन से वाले पापा?’ टिप्पणी पर कोर्ट ने क्यों सुनाया दोषसिद्धि का फैसला

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दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने एक महिला पर की गई टिप्पणी ‘कौन से वाले पापा’ को उसकी गरिमा और शालीनता को ठेस पहुंचाने वाला माना है। अदालत ने इस मामले में आरोपी शख्स को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 509 के तहत दोषी करार दिया है। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास मोक्ष बैंस की अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण सवाल नहीं था, बल्कि इसमें महिला के चरित्र, यौन आचरण और वफादारी पर सीधा सवाल उठाया गया था। दोषी को इस मामले में अभी सजा सुनाई जानी बाकी है।

सड़क पर रो रही थी तीन साल की बच्ची

यह मामला 23 मार्च, 2021 का है। दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में RBI एन्क्लेव गेट के पास प्रियंका गुप्ता नाम की महिला अपनी तीन साल की बेटी के साथ जा रही थीं। बच्ची रो रही थी। उसे चुप कराते हुए प्रियंका ने कहा, ‘देखो पापा आ गए, रोओ मत।’ तभी सड़क के किनारे कपड़े प्रेस करने की रेहड़ी लगाने वाले गिरधारी लाल ने टोकते हुए पूछा, ‘कौन से वाले पापा आ गए?’ प्रियंका ने शुरू में इस टिप्पणी पर ध्यान नहीं दिया। करीब दो मिनट बाद उनके पति कार से वहां पहुंचे और प्रियंका ने बच्ची उन्हें सौंप दी। बाद में महिला ने यह पूरी घटना अपने ससुर को बताई। ससुर ने पुलिस को फोन कर मामले की शिकायत की, जिसके बाद FIR दर्ज की गई।

‘यह बदतमीजी या मजाक से कहीं ज्यादा गंभीर’

ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास मोक्ष बैंस ने 24 सितंबर को मामले में अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जिस हालात में यह टिप्पणी की गई, उसमें एक यौन रूप से अपमानजनक इशारा छिपा था। अदालत ने फैसले में दर्ज किया कि इस तरह का आरोप सिर्फ बदतमीजी या मजाक-मजाक में कही गई बात से कहीं ज्यादा गंभीर है। कोर्ट के मुताबिक, इस टिप्पणी का साफ मतलब यह था कि एक से ज्यादा पुरुष हो सकते हैं जिन्हें उस बच्चे का पिता कहा जा सके। यह महिला की वफादारी पर सवाल उठाने जैसा है।

‘बुरे इरादे’ वाली दलील सिरे से खारिज

सुनवाई के दौरान आरोपी गिरधारी लाल ने स्वीकार किया कि उसने यह टिप्पणी की थी। बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि ये शब्द बिना किसी ‘बुरे इरादे’ के कहे गए थे। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि शब्दों का मतलब सिर्फ उनके शाब्दिक अर्थ से नहीं, बल्कि उन खास हालात से निकलता है जिनमें वे कहे गए हों। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई परिस्थिति सामने नहीं आई है जिससे इस टिप्पणी का कोई ‘मासूम मतलब’ निकाला जा सके।

स्वतंत्र गवाह की जरूरत नहीं, शिकायतकर्ता की गवाही पुख्ता

बचाव पक्ष ने अभियोजन के मामले पर शक जताने के लिए यह तर्क भी दिया कि मौके पर कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था। अदालत ने इस आधार को अमान्य कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में तय किया कि शिकायतकर्ता महिला खुद इस पूरी घटना की प्रत्यक्ष गवाह है। सुनवाई के दौरान टिप्पणी के बारे में उसकी गवाही पर कोई आंच नहीं आई। अदालत ने इसी गवाही को पुख्ता मानते हुए गिरधारी लाल को IPC की धारा 509 (शब्द, इशारा या हरकत जिसका मकसद महिला की लज्जा का अपमान करना हो) के तहत दोषी ठहराया।