क्या मोटी सैलरी की चाहत में मौत के रास्ते पर…जानें विदेशी जहाजों पर भारतीय नाविकों की मौत ज्यादा क्यों?

ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा का संकट।

खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर हमलों के बीच भारतीय नाविकों की सुरक्षा और उनकी स्वदेश वापसी बड़ी चिंता बनी हुई है।

जहाज़ पर चढ़ते वक्त एक भारतीय नाविक के दिमाग में दो हिसाब चल रहे होते हैं। पहला, घर की EMI, बच्चों की पढ़ाई और बूढ़े मां-बाप का खर्चा। दूसरा, उस रूट का खतरा। कई बार पहला हिसाब दूसरे पर भारी पड़ जाता है। ईरान-अमेरिका की जंग में यही हुआ, और इसकी कीमत भारत ने सबसे ज़्यादा चुकाई है।

आंकड़े जो चौंकाते हैं

फरवरी में शुरू हुए इस संघर्ष के बाद से मर्चेंट जहाज़ों पर हुए हमलों में 16 भारतीय नाविक अपनी जान गंवा चुके हैं। 33 घायल हैं और 3 अब तक लापता हैं। किसी भी दूसरे देश के मुकाबले ये सबसे बड़ा आंकड़ा है। फिर भी सरकार ने नाविकों के इस कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन में जाने पर रोक नहीं लगाई।

आखिर सबसे ज़्यादा भारतीय ही क्यों मरे?

वजह सीधी है, क्योंकि जहाज़ों पर सबसे ज़्यादा भारतीय ही काम करते हैं। फिलीपींस के बाद भारत दुनिया को सबसे ज़्यादा नाविक देता है। 2013 में देश में करीब 1.03 लाख नाविक थे, जो 2025 में बढ़कर 3.23 लाख हो गए। मिडिल ईस्ट में तो भारतीय सबसे बड़ी नाविक नेशनलिटी हैं। मतलब किसी भी जहाज़ पर चले जाइए, क्रू में कोई न कोई भारतीय मिल ही जाएगा।

दूसरी बड़ी बात ये कि सरकार जिन जहाज़ों पर नज़र रखती है, उन पर काम करने वाले 90% से ज़्यादा भारतीय नाविक विदेशी झंडे वाले जहाज़ों पर हैं। इसीलिए 16 मृतकों में से 15 विदेशी जहाज़ों पर थे। भारतीय झंडा जहाज़ को डिप्लोमैटिक सुरक्षा देता है, पर समंदर में काम करने वाले ज़्यादातर भारतीय उस छतरी के नीचे आते ही नहीं।

सरकार ने रोका क्यों नहीं?

DGMA (डायरेक्टर जनरल ऑफ शिपिंग) बैन नहीं लगाता, सिर्फ़ एडवाइज़री जारी करता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, लाल सागर और अदन की खाड़ी को हाई-रिस्क ज़ोन घोषित किया गया है और कंपनियों को पूरी सावधानी बरतने को कहा गया है।

हां, 5 अगस्त को एक सख़्त नियम आया। सर्कुलर 47 के तहत जहाज़ मालिक या क्रूइंग एजेंसी को होर्मुज से जहाज़ ले जाने से पहले DGMA को बताना होगा और जहाज़ पर मौजूद हर भारतीय नाविक से लिखित रज़ामंदी लेनी होगी। नाविक की मर्ज़ी के बिना कोई भारतीय इस रास्ते से नहीं गुज़र सकता।

फिर नाविक तैयार क्यों हो जाते हैं?

पैसा। शिपिंग कंपनियां इन खतरनाक रूट्स पर आम सैलरी से 2 से 3 गुना ज़्यादा देती हैं। कुछ लोगों के लिए ये लालच है, तो कुछ के लिए सीधी मजबूरी। कानूनी तौर पर सरकार का तर्क ये है कि UNCLOS (संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन) के तहत व्यापारिक जहाज़ों को “इनोसेंट पैसेज” का हक है, यानी शांति से आने-जाने का अधिकार। साथ ही मर्चेंट शिपिंग ऐक्ट 2025 में नाविकों को “की-वर्कर” का दर्जा मिला है और सुरक्षित कार्यस्थल का अधिकार भी।

क्या हमारे नाविक वहां फंसे हैं?

इसका जवाब इस पर टिका है कि “फंसना” किसे कहेंगे। DGMA के अधिकारी मानते हैं कि होर्मुज पार करने की कोशिश कर रहे जहाज़ों पर मिसाइल और गोले दागे गए हैं, और जिस इलाके में पार करना ही जोखिम भरा हो, वहां जहाज़ को फंसा हुआ माना जा सकता है। लेकिन DGMA का लिखित जवाब थोड़ा अलग है। उसमें कहा गया है कि क्रू लगातार बदले जा रहे हैं और कोई भी नाविक अपने कॉन्ट्रैक्ट की अवधि से ज़्यादा किसी जहाज़ पर अटका नहीं है।

8 अक्टूबर तक DGMA फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर और अदन की खाड़ी में भारत से जुड़े 38 जहाज़ों पर नज़र रख रहा था। इनमें 750 भारतीय नाविकों वाले 30 भारतीय झंडे के जहाज़ और भारत आ रहे कार्गो वाले 8 विदेशी झंडे के जहाज़ हैं। इनमें कंटेनर शिप, क्रूड और प्रोडक्ट टैंकर, बल्क कैरियर और LPG कैरियर शामिल हैं।

कंट्रोल रूम शुरू होने के बाद से अब तक 4,292 से ज़्यादा भारतीय नाविकों को गल्फ से हवाई रास्ते से सुरक्षित वतन लाया जा चुका है। कंट्रोल रूम को नाविकों, परिवारों और कंपनियों से 19,800 कॉल और करीब 55 हज़ार ईमेल मिल चुके हैं। मई में शुरू हुए eNavik ट्रैकिंग डैशबोर्ड के ज़रिए 1,970 से ज़्यादा जहाज़ों पर सवार 19,609 भारतीयों पर नज़र रखी जा रही है।

प्रतिबंधित जहाज़ों का पेंच

9 जून को अमेरिकी फोर्सेज़ ने ओमान के पास पलाऊ के झंडे वाले टैंकर MT Settebello पर हमला किया, जिसमें 3 भारतीय नाविक मारे गए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड का कहना था कि इस जहाज़ ने ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी तोड़ने की कोशिश की थी।

भारत का रुख़ साफ़ है। विदेश मंत्रालय के हवाले से DGMA ने कहा कि भारत सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र के लगाए प्रतिबंध मानता है, किसी अकेले देश के एकतरफ़ा बैन नहीं। यानी अमेरिकी बैन वाले जहाज़ों पर भारतीयों के काम करने पर भारत की तरफ़ से कोई रोक नहीं है।

हालांकि कागज़ी कार्रवाई सख़्त हुई है। रिक्रूटमेंट एंड प्लेसमेंट सर्विस लाइसेंस (RPSL) वाली एजेंसियों को अब क्रू साइन करवाने से पहले जहाज़ के मालिकाना हक, झंडे, बीमा और सर्टिफिकेट की पूरी जांच करनी होगी। इसके अलावा DGS ऑर्डर नंबर 08/2026 के तहत ऐसे 366 विदेशी जहाज़ों पर रोक लगाई गई है, जिन पर नाविकों को बीच रास्ते छोड़ देने के 2 से ज़्यादा मामले दर्ज हैं। अब ये जहाज़ अप्रूव्ड एजेंसियों के ज़रिए भारतीय नाविक नहीं रख सकते।

जान जाने पर परिवार को क्या मिलता है?

जंग जैसे जोखिम वाले इलाके में किसी नाविक की मौत होने पर सीफेयरर्स वेलफेयर फंड सोसाइटी 10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि (ex gratia) देती है। इसके अलावा नेशनल यूनियन ऑफ सीफेयरर्स ऑफ इंडिया के सदस्यों को 10 लाख और मैरीटाइम यूनियन ऑफ इंडिया के सदस्यों को 12 लाख रुपये अलग से मिलते हैं। जहाज़ मालिक का P&I बीमा प्रदाता क्रू कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के हिसाब से मुआवज़ा देता है।

जो बच गए, उनके लिए क्या?

DGMA खुद को एक रेगुलेटर बताता है, एम्प्लॉयर नहीं। जो नाविक दोबारा काम ढूंढना चाहते हैं, उन्हें उनकी पैरेंट कंपनियों की तरफ़ भेजा जाता है। जो वापस समंदर में नहीं जाना चाहते, उन्हें वेतन और बकाया दिलवाने और बीमा क्लेम में मदद दी जाती है। खोए हुए डॉक्यूमेंट मुफ़्त में दोबारा बनाए जाते हैं।

वेलफेयर फंड की योजनाओं में मौत पर सर्वाइवर बेनिफिट या विकलांगता की हालत में 6-6 लाख रुपये मिलते हैं, गंभीर बीमारी पर 2 लाख रुपये। जिन नाविकों को जहाज़ ने बीच में छोड़ दिया, उन्हें 12 महीने तक हर महीने 20 हज़ार रुपये दिए जाते हैं।

कुल मिलाकर बात ये है

भारतीय नाविक दुनिया का सामान ढो रहे हैं, पर जब जान पर बनती है तो वो अक्सर ऐसे जहाज़ों पर होते हैं जिन पर भारत का झंडा ही नहीं। सरकार एडवाइज़री, सहमति और ट्रैकिंग का सहारा ले रही है, लेकिन जब तक सैलरी का फ़र्क और मजबूरी बनी रहेगी, कुछ लोग खतरे का दरवाज़ा खुद खोलते रहेंगे।