यूपी चुनाव 2027: अवध की 118 सीटों का गणित, BJP-सपा-कांग्रेस में किसकी तैयारी?
अवध क्षेत्र में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा, सपा और कांग्रेस अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी हैं।
उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में अवध क्षेत्र की 118 सीटों पर भाजपा, समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने में जुटी हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक हालिया सर्वे में अवध में भाजपा गठबंधन को 77 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है, हालांकि रिपोर्ट में खुद कहा गया है कि ऐसे सर्वे मतदाताओं के रुझान की झलक भर होते हैं और इन्हें चुनावी नतीजा नहीं माना जा सकता।
भाजपा का जातीय आधार क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया समुदाय भाजपा का सबसे मजबूत आधार बने हुए हैं, जबकि लोध और निषाद मतदाता भी ज्यादातर पार्टी के साथ माने जाते हैं। पिछले चुनाव में भाजपा ने अवध और देवीपाटन में कुर्मी उम्मीदवारों को कम टिकट दिए थे, जबकि सपा ने इन इलाकों में ज्यादा कुर्मी उम्मीदवार उतारे थे।
ओबीसी वोट को लेकर भाजपा की चिंता क्यों बढ़ी?
2024 के लोकसभा चुनाव में ओबीसी वोट को लेकर भाजपा की चिंता बढ़ी है और पार्टी अब सपा के पीडीए फॉर्मूले की काट के लिए ओबीसी पर फोकस कर रही है। सितंबर 2026 में भाजपा ने पश्चिम, ब्रज, कानपुर-बुंदेलखंड, अवध, काशी और गोरखपुर क्षेत्रों के लिए नई क्षेत्रीय कमेटियां बनाईं, हालांकि मीडिया रिपोर्टस बताते हैं कि इनमें जातीय और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर सवाल उठे हैं।
सपा किन वर्गों पर दांव लगा रही है?
सपा 2022 की रणनीति के बजाय 2024 के लोकसभा चुनाव वाले मॉडल पर आगे बढ़ने की तैयारी में है, जिसमें पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए का फॉर्मूला केंद्र में है। रिपोर्टस के अनुसार 2024 में मुस्लिम मतदाताओं का करीब 90 फीसदी समर्थन सपा और इंडिया गठबंधन को मिला था और 2027 में भी यह एकजुटता बने रहने की उम्मीद जताई गई है। यह भी संभावना जताई जा रही है कि गैर-जाटव दलित बंटे रह सकते हैं, जिनमें सपा को हल्की बढ़त मिल सकती है, जबकि कुर्मी मतदाता कुछ हिचकिचाहट के साथ सपा की ओर थोड़ा झुके हुए बताए जा रहे हैं।
ब्राह्मण वर्ग को अपनी ओर खींचना चाहती है सपा
अखिलेश यादव ब्राह्मण मतदाताओं तक भी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे भाजपा के सवर्ण आधार में से ब्राह्मण वर्ग को अपनी ओर खींचना चाहते हैं, और इसी कड़ी में सपा ने अयोध्या सीट से पूर्व विधायक पवन पांडेय को उम्मीदवार घोषित किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को हराया था, लेकिन अयोध्या विधानसभा सीट पर भाजपा का रिकॉर्ड मजबूत रहा है। लल्लू सिंह 1991 से 2007 तक लगातार पांच बार यहां से विधायक चुने गए थे।
रायबरेली और अमेठी से आगे कांग्रेस की क्या है रणनीति?
रायबरेली और अमेठी कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ माने जाते हैं। पूर्व के समय में प्रतापगढ़, उन्नाव, बाराबंकी और फैजाबाद जैसी सीटों का भी जिक्र किया जाता था, जहां कांग्रेस की मौजूदगी मानी जाती थी। हालांकि, साल 2014 में कांग्रेस ने सवर्ण और कुर्मी वोट भाजपा के हाथों और मुस्लिम वोट सपा के हाथों खोए थे। कांग्रेस नेताओं के अनुसार, पार्टी सभी 403 सीटों पर चुनाव की तैयारी कर रही है, लेकिन गठबंधन पर अंतिम फैसला हाईकमान लेगा। मीडिया रिपोर्ट में एक सर्वे फॉर्मूले के तहत कांग्रेस को 75 सीटें मिलने की बात सामने आई है, जबकि कांग्रेस करीब 150 से 200 सीटों की मांग कर रही है।
दलित वोट और छोटे दल अवध का समीकरण कैसे बदल सकते हैं?
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ एक सीट जीत पाई थी, और उसकी निष्क्रियता के कारण दलित वोट सपा और भाजपा के बीच बिखर गया था। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने हाल में 45 सीटों पर प्रभारी तय किए हैं और उसके अध्यक्ष चंद्रशेखर का फोकस दलित और मुस्लिम मतदाताओं पर है। चंद्रशेखर और अखिलेश यादव के बीच नजदीकी बढ़ने से 2027 में गठबंधन की अटकलें हैं, लेकिन आजाद समाज पार्टी के एक नेता ने इस पर फैसला उचित समय पर करने की बात कही है।
