उदयपुर के जंगलों में 200 करोड़ के गांजे की खेती, पुलिस और तस्करों का नेटवर्क

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राजस्थान में मादक पदार्थों की तस्करी अब सिर्फ सीमाओं और हाइवे तक सीमित नहीं है। राज्य के दुर्गम जंगलों और बीहड़ों में नशे का एक बड़ा समानांतर साम्राज्य तैयार हो चुका है। एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) की एक बड़ी कार्रवाई में उदयपुर के कोटड़ा और मांडवा के घने पहाड़ी इलाकों में 57 हेक्टेयर (करीब 250 बीघा) जमीन पर हो रही गांजे की अवैध खेती का भंडाफोड़ हुआ है।

यह कोई छोटी-मोटी पैदावार नहीं, बल्कि ‘कॉरपोरेट स्टाइल’ में की जा रही व्यावसायिक स्तर की खेती थी, जिसकी कीमत बाजार में करीब 200 करोड़ रुपये आंकी गई है। ANTF की 70 सदस्यीय टीम ने इस विशाल फसल को नष्ट कर दिया है।

आदिवासियों को लालच देकर तस्कर करा रहे खेती

उदयपुर का कोटड़ा और मांडवा इलाका कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यह ड्रग सिंडिकेट का हब बन चुका है। जांच में सामने आया है कि अंतर्राज्यीय तस्कर गिरोह स्थानीय भोले-भाले आदिवासियों को ‘कैश क्रॉप’ (तुरंत नकद देने वाली फसल) का लालच देकर उनसे गांजे की खेती करवा रहे हैं।

दुर्गम पहाड़ियों पर 56 अलग-अलग खसरों में गांजे के करीब 1 लाख 33 हजार पौधे लहलहा रहे थे, जिनसे लगभग 40 हजार किलो उच्च गुणवत्ता (सुपर-क्वालिटी) का गांजा तैयार होना था।

कुंभ मेले तक जाता है उदयपुर का गांजा

पूछताछ में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि इस इलाके में पैदा होने वाले गांजे की क्वालिटी के कारण तस्करों के बीच इसकी भारी डिमांड है। पिछले आयोजनों में इसी इलाके का गांजा विशेष मांग पर कुंभ और महाकुंभ जैसे बड़े धार्मिक मेलों तक सप्लाई किया गया था। इससे साफ होता है कि यह सिंडिकेट राजस्थान से लेकर देश के कई राज्यों तक अपनी जड़ें जमा चुका है।

तस्कर गिरोह फसल बोने से लेकर पकने तक पर्दे के पीछे ही रहता है और फसल कटाई के वक्त सक्रिय होता है। पिछले एक साल में मांडवा और उसके आसपास के इलाकों में अवैध गांजे और अफीम के छह से ज्यादा बड़े मामले सामने आ चुके हैं।

स्थानीय प्रशासन और खुफिया तंत्र पर उठते सवाल

इस भंडाफोड़ ने पुलिस और प्रशासनिक खुफिया तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 250 बीघा जमीन पर गांजे की इतनी बड़ी फसल रातों-रात तैयार नहीं होती, इसमें महीनों का समय लगता है। ऐसे में बीट कॉन्स्टेबल से लेकर स्थानीय पटवारी और गिरदावर तक को इसकी भनक न लगना, किसी बड़ी मिलीभगत या घोर लापरवाही की ओर इशारा करता है।