चीन और पाकिस्तान का संयुक्त सैन्य अभ्यास, भारत की सुरक्षा के लिए क्या हैं मायने?
चीन और पाकिस्तान की थल सेनाएं अक्टूबर के मध्य से आखिरी हफ्ते के बीच चीन के शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र के कोरला इलाके में अपना पहला नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास करने जा रही हैं। इस युद्धाभ्यास को ‘काराकोरम 2026’ (Karakoram 2026) नाम दिया गया है। आधिकारिक तौर पर इसे आतंकवाद विरोधी अभियान बताया जा रहा है, लेकिन भारत के लिए इस संयुक्त सैन्य ड्रिल का रणनीतिक महत्व कहीं अधिक व्यापक और चिंताजनक है।
‘काराकोरम 2026’ में क्या-क्या होगा?
चीन के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने 10 अक्टूबर को इस सैन्य अभ्यास की घोषणा की थी। इसका मुख्य फोकस ऊंचाई वाले और दुर्गम इलाकों में संयुक्त आतंकवाद विरोधी अभियानों पर रहेगा। इस अभ्यास में शामिल प्रमुख गतिविधियां हैं:
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ड्रोन ऑपरेशंस (Drone Operations)
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चलते हुए लक्ष्य (Moving Targets) की तलाश और उन पर गोलीबारी
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लंबी दूरी से सटीक निशाना साधना
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संयुक्त कमान की प्रक्रियाएं और वास्तविक सैन्य बलों के साथ तालमेल
चीनी अधिकारियों के अनुसार, इसका मकसद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को गहरा करना और आतंकी खतरों से निपटने के लिए सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाना है।
भारत की चिंता: दो मोर्चों (Two-Front) पर एक साथ खतरा
चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य साझेदारी पहले से ही काफी मजबूत है। भारत के दोनों देशों के साथ सीमा और क्षेत्रीय विवाद अनसुलझे हैं। ऐसे में पहली बार दोनों देशों की थल सेनाओं की नियमित इकाइयों का यह संयुक्त प्रशिक्षण भारत की पश्चिमी (LoC) और उत्तरी (LAC) सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों को बढ़ा सकता है।
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि एक-दूसरे के हथियारों, कमान प्रणालियों और संचालन के तरीकों से परिचित होने के बाद, संकट की स्थिति में चीन और पाकिस्तान की सेनाएं भारत के खिलाफ अधिक तेजी और बेहतर तालमेल से कार्रवाई कर सकती हैं। पाकिस्तान की सेना पहले से ही चीनी रक्षा उपकरणों—जैसे HQ9 एयर डिफेंस सिस्टम, PL-15E एयर-टू-एयर मिसाइल और ड्रोन्स—पर अत्यधिक निर्भर है।
अभ्यास के लिए चुना गया स्थान क्यों है खास?
अभ्यास के लिए चुना गया शिनजियांग क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। इसकी सीमा भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्से में पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र (PoK) से लगती है। साथ ही यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के भी करीब है। एक प्रमुख सैन्य विश्लेषक के अनुसार, “यहां का भूभाग भारत की रणनीतिक सीमाओं के आसपास के ऊंचाई वाले क्षेत्रों से काफी मिलता-जुलता है।”
लद्दाख विवाद के बीच कूटनीतिक तनातनी
यह युद्धाभ्यास ऐसे समय में हो रहा है जब लद्दाख को लेकर भारत और चीन के बीच हालिया कूटनीतिक विवाद हुआ है। 2 अक्टूबर को भारत सरकार ने लद्दाख के 28 स्थानों (जिनमें गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स भी शामिल हैं) के नामों को मानकीकृत (Standardized) किया था। 13 अक्टूबर को चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने इसे ‘एकतरफा और अवैध’ बताकर खारिज कर दिया। इसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने उसी दिन स्पष्ट किया कि “केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है, और चीन के इनकार से यह स्थापित तथ्य नहीं बदल सकता।”
भारत के लिए आगे की रणनीति
सैन्य मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत को ‘काराकोरम 2026’ को तत्काल युद्ध के खतरे के बजाय एक ऐसे घटनाक्रम के रूप में देखना चाहिए जिस पर करीब से नजर रखने की जरूरत है। भारत को बिना ठोस सबूतों के हथियारों की क्षमता के निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए।
भारत को इन कदमों पर देना होगा जोर:
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स्वदेशी रक्षा उत्पादन और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को तेज करना।
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मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम और एंटी-ड्रोन तकनीक का विकास।
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खुफिया जानकारी, निगरानी (Surveillance) क्षमताओं और मजबूत रसद (Logistics) व्यवस्था में निवेश।
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इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (Electronic Warfare) में अपनी क्षमताओं को उन्नत करना।
कुल मिलाकर, ‘काराकोरम 2026’ चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तालमेल का एक संस्थागत रूप है। नई दिल्ली के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी सीमाओं पर किसी भी उभरती हुई संयुक्त चुनौती से निपटने के लिए अपनी राष्ट्रीय क्षमताओं का निरंतर विस्तार करती रहे।
