शक्ति की आराधना का महापर्व नवरात्र, जानिए मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का संदेश

नवरात्र का पर्व हिन्दूवर्ष गणना के अनुसार एक वर्ष मे दो बार आता है प्रथम वासन्ती नवरात्र, दूसरा शारदीय नवरात्र है। दोनों नवरात्र शक्ति को समर्पित है। वर्ष में दोनों नवरात्रोँ का भारतीय समाज और संस्कृति मे विशेष स्थान है।ये शक्ति- उपासना तथा आस्था और विश्वास के पर्व हैं। यह पावन पर्व प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नई उर्जा और नये उत्साह का संचार करने वाला होता है। यह दोनों पर्व साधारणतया नौ- दिनों के होते हैं। लेकिन इस बार शारदीय नवरात्र नौ के जगह पर दस दिनों का है।
शारदीय नवरात्र में तिथियों का विशेष संयोग
ज्योतिषाचार्य विभोर इंदुसुत के अनुसार “इस बार सप्तमी तिथि 17एवं 18 अक्टूबर दोनों ही दिन सूर्योदयकाल मे उपस्थित होगी। इस कारण सातवां नवरात्र दो दिन 17 एवं 18 दो दिन मनाया जाएगा। इसीलिए नौ की जगह दस दिनों का होगा। धर्मशास्त्रों के अनुसार, नवरात्र की संख्या का बढना बहुत ही दुर्लभ और शुभ योग होता है।”
आचार्यों के अनुसार नवमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10.51 बजे से 20 अक्टूबर को अपराह्न 12.50 बजे तक रहेगी। उदयकालीन नवमी तिथि 20 अक्टूबर को ही मानी जाएगी। इसबार शारदीय नवरात्र में प्रतिपदा अर्थात 11 नवंबर को पहला नवरात्र माँ शैलपुत्री को समर्पित, दूसरा नवरात्र द्वितिया 12 अक्टूबर को माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित, तृतीया 13 नवंबर माँ चन्द्रघंटा देवी को समर्पित, चौथा नवरात्र चतुर्थी 14 नवंबर माँ कुष्मांडा देवी को समर्पित है। पांचवा नवरात्र दिन पंचमी तिथि 15 नवंबर को माँ स्कन्दमाता को, छठा नवरात्र षष्ठिमी तिथि 16 नवंबर को माँ कात्यायनी, सातवां नवरात्र सप्तमी तिथि 17/18 को माँ कालरात्रि को, आठवां नवरात्र अष्टमी तिथि 19 नवंबर को माँ महागौरी को समर्पित है।
वैसे तो 18 अक्टूबर को उदयाकाल के बाद अष्टमी शुरू हो जाएगी और अगले दिन अर्थात 19 अक्टूबर को 10.51 तक अष्टमी का योग है। इसलिए 19 अक्टूबर को ही सूर्योदयकाल मे अष्टमी का पूजन विधि – विधान से होगा। लेकिन की नौवां नवरात्र नवमी ( महानवमी)20 अक्टूबर माँ सिद्धिदात्री को समर्पित है। विजयदशमी तिथि 20 अक्टूबर को ही दोपहर 12.50 बजे के बाद शुरू होकर 21 नवंवर 2.11 बजे तक तक रहेगी। रावण दहन सांध्यकाल में ही मान्य होने के कारण 20 अक्टूबर को सांध्यकालीन मुहूर्त में होगा। दशहरा उपरोक्त दोनों तिथियों में होगा। लेकिन असली दशहरा -दश -हरा अर्थात दशँ सिर वाले का हरण यानी दशानन का वध 20 नवंबर को ही हो जायेगा। दोनों तिथियों में दशहरा धूमधाम से मनाया जाएगा। राहुल अग्रवाल के अनुसार महानवमी तिथि 20 अक्टूबर को प्रातःकाल से शुरू होकर दोपहर 12.51 तक रहेगी। विशेष परिस्थिति में 19 अक्टूबर को भी नवमी पूजन 11 बजे के बाद शुभ मुहूर्त मे किया जा सकता है।
माँ का आगमन हाथी पर: सुख-समृद्धि और वर्षा की मान्यता
इस वर्ष सबसे विशेष यह है कि माँ का आगमन हाथी पर ( गज वाहन पर )हुआ है। गज वाहन पर माँ का आगमन शुभ और सुख – समृद्धि व धन -धान्य को संबर्धित करने का सूचक माना जाता है। हाथी पर सवार होकर आने के कारण अच्छी बरसात अर्थात कृषि कार्य के अनुकूल माकूल वर्षा का भी योग बनता है।
अच्छी और अनुकूल वर्षा के कारण कृषि की पैदावार भी अच्छी होगी जिससे देश के किसान वर्ग में खुशी का वातावरण रहेगा। पैदावार अच्छी होने के कारण जीडीपी में बढोत्तरी होना स्वाभाविक है तथा देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। देवी किस वर्ष किस वाहन पर सवार होकर आयेंगी इसके दिन सुनिश्चित है। देवी भागवत मे कहा गया है – “शशिसूर्ये गजारूढा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बधे नौका प्रकीर्तिता।।” देवी भागवत के इस श्लोक के अनुसार रविवार या सोमवार के दिन कलश की स्थापना होने पर दुर्गा माँ का हाथी पर सवार होकर आना शुभ माना गया है और माकूल एवं अनुकूल वर्षा के साथ ही कठिन परिश्रम करने वालों को मनोवांछित फल प्राप्ति के साथ -साथ माँ का ध्यान, पूजन- उपासना करने पर माँ की विशेष कृपा भी बरसती है।
देवी के वाहन और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ
शनिवार व मंगलवार के दिन नवरात्र प्रारंभ होने पर माँ घोडे पर सवार होकर आती हैं। आचार्य गणों एवं शास्त्रानुसार माँ का घोडे पर सवार होकर आने से सत्ता परिवर्तन तथा युद्ध का योग बनता है। सत्ता पक्ष के लिए अशुभ और विपक्ष के लिए यह शुभ का संकेतसूचक होता है। गुरुवार या शुक्रवार के दिन नवरात्र प्रारंभ होने पर माँ पालकी पर बैठकर आतीं हैं तथा यह अशुभ और देश दुनिया में महामारी, दंगा -फसाद, प्राकृतिक आपदा, जनहानि होने का इससे संकेत मिलता है। इसी तरह बुधवार को नवरात्र प्रारंभ होने पर माँ नाव पर सवार होकर आती हैं, नाव पर सवार होकर माँ का आगमन शुभ और अच्छी बरसात होने तथा पैदावार अच्छा होने का संकेत देता है। साथ ही प्रत्येक मनुष्य की मनोकामना पूर्ण होने के साथ – साथ अपने भक्तों का माँ कष्ट निवारण भी करती हैं। माँ का प्रस्थान बुधवार या शुक्रवार को होने से माँ की सवारी गजवाहन होता है जो शुभ सूचक माना जाता है। यदि बृहस्पतिवार को दशमी पडती है तो माँ की सवारी मनुष्य होता है और मनुष्य की सवारी होना शुभ माना गया है। इससे सर्वत्र सुख – शान्ति तथा संपन्नता रहती है।
माँ का प्रस्थान और दुर्गा स्वरूप की महिमा
इस बार माँ का प्रस्थान चरणायुद्ध अर्थात मुर्गे पर होगा, जो शास्त्रों के अनुसार अशुभ माना गया है। दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण माँ भगवती दुर्गा नाम से सुविख्यात हैं। देवी भागवत के अनुसार माँ का वाहन शेर है, लेकिन वह प्रत्येक वर्ष अलग – अलग वाहनों पर सवार होकर आती हैं।
घट स्थापना और पूजा की विधि
घट स्थापना के संबंध में ज्योतिषाचार्य भारत ज्ञान भूषण जी के अनुसार “चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा होनी चाहिए कलश में साफ सुथरी जगह से लायी हुई मिट्टी डालकर उसको गंगाजल से तरकर जौ बोना चाहिए। साथ ही कलश पर आम के पांच पत्ते रखकर नारियल को स्थापित करना शुभ फलदायी होता है। ”
कुण्डलिनी शक्ति: मनुष्य के भीतर विद्यमान चेतना
माँ पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त चैतन्य शक्ति स्वरुपा हैं। यह चेतना मनुष्य के अन्त: मे कुण्डलिनी के रूप मे विद्मान है। मां आनन्दमूर्ति का इस संबंध में कहना है कि – “कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र मे सुषुप्ता अवस्था मे होती है। मूलाधार आदि सात चक्र मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में स्थित हैं। मूलाधार चक्र में उल्टे त्रिकोण के रक्त वर्ण स्वरूप में स्थित यह आदिशक्ति कुण्डलिनी जब तक सुप्त अवस्था में जब तक रहती है तब तक मनुष्य का जीवन उन्नत नही हो पाता। योग विशेषकर राजयोग और चक्रानुसंधान- योग इस सुप्त शक्ति को जाग्रत करने के लिए विभिन्न प्रकार की साधनाओं को इंगित करते हैं। तंत्र के प्राचीन गंर्थों के अनुसार शक्ति हर मानव शरीर में कुण्डलिनी के रूप से मूलाधार चक्र में विराजमान है।” प्राय: यह शक्ति मूलाधार मे सुप्त रह जाती है और मनुष्य की यह चेतना निम्न तलों पर रहते हुए ही नष्ट हो जाती है। चूंकि शिव सातवें सहस्त्रार चक्र में स्थित हैं। जब तक इन शिव तथा शक्ति का संगम नही होता तब तक मनुष्य का संपूर्ण जीवन पूर्ण रूप से परिपक्व और समुन्नत नही हो पाता। मनुष्य के अन्त:करण में विद्मान कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर मनुष्य को शव से शिव में रुपांतरित कर देती है।
क्या केवल बाहरी पूजा ही नवरात्र का वास्तविक अर्थ है?
आजकल नवरात्र का अर्थ आम जन ही नही ज्यादा पढे- लिखे लोग भी यही समझते हैं कि नौ दिनों तक स्थूल दुर्गा मंदिर में या पाण्डाल में स्थापित माँ की स्थूल मूर्ति के समक्ष धूप-दीप – नैवेद्य के साथ फल – फूल,मिष्ठान आदि चढाना, विद्युत उपकरणों की चमक – दमक,ध्वनि प्रसारक यंत्रों से शोर – शराबा कर देना, घंटा घडियाल के साथ पूजा -पाठ करना, शाकाहारी भोजन लेना, तामसी चीजों का परहेज करना, फल, सिंघाडे, कुट्टू के आटें,साबूदाना इत्यादि से निर्मित विविध भांति के व्यंजनों का सेवन करना, इनके साथ और निराहार उपवास कर लेना ही है। लेकिन यह अर्धसत्य क्या अज्ञानता का ही द्योतक है।
प्रकृति के कण-कण में शक्ति की विद्यमानता
शक्ति की विद्यमानता विभिन्न रूपों में प्रकृति के प्रत्येक कण मे है, जैसे विवेक, विद्या, ललित कलाएं, अर्थ के ज्ञान -विज्ञान में पारंगतता, पाक कला आदि कलाओं में नैपुण्यता, फूलों की सुगंध, वृक्षों पर फल आना, लहलहाती फसलों का लहराना, मौसम के परिवर्तित होने में भी शक्ति के बहुविध स्वरूप की विद्यमानता है। अर्थात ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण-कण में, चर-अचर, जड-जंगम, चेतन- अचेतन, जीव- निर्जीव, स्थावर – गतिशील, सबमें शक्ति की विद्यमानता है। बिना शक्ति के इस ब्रह्माण्ड में किसी भी तत्व का अस्तित्व ही नही है। इस प्रकृति मे मनुष्य शक्ति की सबसे उत्कृष्ट देन है। इसलिए इसके जीने का विधि – विधान भी सबसे अलग और सूक्ष्मातिसूक्ष्म है। जब तक मनुष्य इन भेंदों और कारण से अवगत नही होता है तबतक वह पशु से भी निकृष्ट है। समाज परिवार और देश को एक सूत्र में बांधना, सबके साथ बिना भेदभाव के समान भाव से आचरण करना मनुष्य के जीवन का मूल उद्देश्य है। मनुष्य शक्ति के बिना शून्य होता है।
योग-साधना और आत्मिक उन्नति: नवरात्र का आंतरिक संदेश
इसलिए उच्च अध्यात्मिक पथ का अनुगमन करते हुए योगसाधना के माध्यम से विभिन्न सोपानों का आरोहण करते हुए सहज ढंग से अपनी सूक्ष्म चेतना और निहित शक्ति को जाग्रत करने का किसी बुद्ध पुरूष अर्थात गुरू के निर्देशन में सदैव सार्थक- सफल प्रयास करना ही असली और श्रेष्ठ उपासना है। आहार, निद्रा, भय, भोग, मैथुन में संलिप्त रहना, इंद्रियों की इच्छाओं की संतृप्ति में बहुमूल्य जीवन को गुजार देना तो पाशविक प्रवृति है। नवरात्र का उद्देश्य इन नौ दिनों में कुण्डलिनी को जागृत करते हुए विभिन्न चक्रों को पार कर सहस्त्रार पर पहुंचकर सात्विकता के साथ मौन भाव से मगन होकर अमृत – रस का पान करना ही है। यही नौ दिवस का सार्थक अनुष्ठान है। योगासन,, प्राणायाम, षटकर्म, ध्यान- धारणा ही इस अनुष्ठान के मूल आधार हैं।
सनातन संस्कृति में शक्ति के विविध स्वरूप
भारत भूमि अध्यात्मिक दृष्टि से जागृत और सिद्ध भूमि है। यहाँ जगह – जगह साधना के द्वारा स्थापित शक्ति के अनेक सिद्धपीठ हैं तथा शक्ति के अनगिनत चिह्न और धारणाएं हैं जहाँ दुर्गा के रूप मे संकट मोचिनी हैं, काली के रूप मे वह काल और अहंकार की मर्दिनी है, सरस्वती के रूप में ज्ञान-विज्ञान दायिनी हैं, लक्ष्मी के रूप में धन-धान्य समृद्धि दायिनी हैं, तारा के रूप मे ज्ञान निर्देशिनी हैं, वहीं जगदम्बा के स्वरूप मे समस्त सृष्टि की अम्बा, जन्मदायिनी,पालन – पोषण कर्त्री भी हैं। इस प्रकार देखते हैं कि नवरात्र के माध्यम से जगदम्बा के विभिन्न स्वरूपों का हमें साक्षात्कार होता है। इस मानव जीवन में आनेवाला प्रत्येक नवरात्र हमें अपने अंदर निहित शक्तियों को जानने – समझने और उनके समान क्षमा, दया, त्याग, करूणा, उत्साह, शौर्य, जनकल्याण की उल्लसित भावना के साथ तथा लोभ- ईर्ष्या, मोह – मत्सर,असूया से मुक्त आचरण करने का प्रेरणा देता है।
