UP Election 2027: संभल की 5 सीटों पर नए सियासी समीकरण, सपा के गढ़ में AIMIM की दस्तक

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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियां तैयार करनी शुरू कर दी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का संभल जिला हमेशा से राज्य की चुनावी राजनीति के केंद्र में रहा है। नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वे के दौरान भड़की हिंसा और उसके बाद आई न्यायिक आयोग की रिपोर्ट ने इस जिले के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। इस घटनाक्रम और नए सियासी गठजोड़ के बीच जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर मुकाबला नए समीकरणों के तहत होने के संकेत मिल रहे हैं।

2022 में दिखा था सपा का दबदबा

2022 के विधानसभा चुनाव में संभल जिले की पांच विधानसभा सीटों में से चार पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की थी, जबकि भारतीय जनता पार्टी के खाते में केवल एक सीट आई थी।

  • संभल: सपा के इकबाल महमूद ने भाजपा के राजेश सिंघल को करीब 42 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराया था।

  • असमोली: सपा की पिंकी सिंह यादव ने भाजपा के हरेंद्र कुमार को लगभग 25 हजार वोटों से शिकस्त दी थी।

  • बिलारी: सपा प्रत्याशी मोहम्मद फहीम इरफान ने भाजपा के परमेश्वर लाल सैनी को करीब 7,500 मतों से पराजित किया।

  • गुन्नौर: सपा के राम खिलाड़ी सिंह यादव ने यहां से जीत हासिल की।

  • चंदौसी (सुरक्षित): यह जिले की एकमात्र सीट रही जहां भाजपा को सफलता मिली। यहां से भाजपा की गुलाब देवी विधायक चुनी गईं।

जनसांख्यिकी और सपा का प्रभाव

संभल जिला वर्ष 2011 में मुरादाबाद से अलग होकर अस्तित्व में आया था। शुरुआत में इसका नाम ‘भीम नगर’ रखा गया था, लेकिन स्थानीय विरोध के बाद इसे बदलकर संभल कर दिया गया।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक जिले की कुल आबादी करीब 21 लाख 93 हजार है, जिसमें पुरुष 11.61 लाख और महिलाएं 10.32 लाख हैं। जिले में साक्षरता दर लगभग 77 प्रतिशत और लिंगानुपात 908 है। संभल में मुस्लिम आबादी करीब 60 से 70 प्रतिशत के बीच है, जिसके चलते यह प्रदेश के प्रमुख मुस्लिम बहुल जिलों में गिना जाता है।

राजनीतिक रूप से यह क्षेत्र लंबे समय तक समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव परिवार के प्रभाव में रहा है। खासकर गुन्नौर सीट सपा का पारंपरिक गढ़ मानी जाती रही है। हालांकि, 2017 के चुनाव में भाजपा के अजीत कुमार यादव (राजू यादव) ने गुन्नौर जीतकर सपा के इस किले में सेंध लगाई थी। इसके बावजूद, 2017 की लहर में भी जिले की बाकी सीटों पर सपा का प्रभाव बना रहा।

जामा मस्जिद विवाद और AIMIM की एंट्री से बदले समीकरण

संभल की राजनीति में सबसे बड़ा मोड़ नवंबर 2024 की हिंसा के बाद आया, जब शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुए बवाल में पांच लोगों की जान चली गई थी। इस मामले में गठित न्यायिक आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में हिंसा को पूर्व नियोजित साजिश बताया है और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।

इस घटनाक्रम के बीच जामा मस्जिद प्रबंध कमेटी से जुड़े और हिंसा मामले के आरोपियों में शामिल एक स्थानीय नेता ने असदुद्दीन ओवैसी की मौजूदगी में AIMIM की सदस्यता ले ली है। उनके 2027 में चुनाव लड़ने के संकेत हैं। यदि ऐसा होता है, तो अब तक सपा के पक्ष में एकतरफा जाने वाले मुस्लिम मतों में विभाजन की स्थिति बन सकती है। इससे संभल सदर समेत आसपास की सीटों पर चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है।

दूसरी ओर, भाजपा भी इस बदली हुई स्थिति में हिंदू मतदाताओं की लामबंदी और ध्रुवीकरण के जरिए जिले में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

संभल जिले की सीटों का सामाजिक ताना-बाना

  • संभल सदर: इस सीट पर मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ा और निर्णायक समूह है। इसके बाद यादव और अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाता चुनावी परिणाम तय करने में भूमिका निभाते हैं।

  • चंदौसी (सुरक्षित): यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। यहां दलित मतदाताओं की तादाद सबसे अधिक है, जबकि सामान्य वर्ग और मुस्लिम मतदाता भी अहम भूमिका निभाते हैं।

  • बिलारी: यह मुस्लिम बहुल विधानसभा सीट है। यहां सैनी और अन्य पिछड़ी जातियों का वोट बैंक नतीजों में निर्णायक साबित होता है।

  • असमोली: यहां यादव और मुस्लिम मतदाताओं का गठजोड़ चुनावी रूप से सबसे मजबूत माना जाता है।

  • गुन्नौर: यह यादव बहुल सीट है। इसके साथ ही मुस्लिम आबादी और सहसवान क्षेत्र से जुड़े मतदाता यहां जीत-हार तय करते हैं।