हापुड़ की 3 विधानसभा सीटों का सियासी गणित, कभी कांग्रेस का था एकछत्र राज, अब BJP और SP में है सीधी टक्कर
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी जमीनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। पश्चिमी यूपी और दिल्ली-NCR से सटे हापुड़ जिले की राजनीति हमेशा से प्रदेश की सत्ता के लिए अहम मानी जाती रही है। यह जिला बड़े कृषि व्यापार, स्टील उत्पादों, अनाज, गुड़ और गन्ने की बड़ी मंडी होने के साथ-साथ अपने धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रसिद्ध है। जिले के अंतर्गत तीन प्रमुख विधानसभा सीटें आती हैं—हापुड़ सदर, गढ़मुक्तेश्वर और धौलाना। इन तीनों सीटों का राजनीतिक मिजाज और चुनावी इतिहास बेहद अलग और रोचक रहा है।
हापुड़ विधानसभा: कांग्रेस के वर्चस्व से लेकर BJP के लगातार जीत तक
आजादी के बाद शुरुआती दौर में हापुड़ विधानसभा क्षेत्र दो हिस्सों में बंटा था—हापुड़ नॉर्थ और हापुड़ साउथ। वर्ष 1951 के पहले आम चुनाव में दोनों सीटों पर कांग्रेस का दबदबा रहा। हापुड़ नॉर्थ से प्रकाशवती और साउथ से लुफ्त अली खान विधायक चुने गए। 1957 में भी कांग्रेस ने यह सिलसिला बरकरार रखा। हालांकि, 1962 में एक निर्दलीय उम्मीदवार प्रेम सुंदर नारायण सिंह ने कांग्रेस को शिकस्त देकर बड़ा उलटफेर किया था।
1967 में इस सीट को अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित कर दिया गया। आरक्षण लागू होने के बाद हुए पहले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के डीडी सेन को जीत मिली। इसके बाद 1969 में बीकेडी के लक्ष्मण स्वरूप, और 1974 व 1980 में कांग्रेस के भूप सिंह केन विधायक बने। 1985 और 1989 में कांग्रेस नेता गजराज सिंह ने यहां से लगातार दो बार जीत दर्ज की।
90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के दौरान यहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने दस्तक दी। 1991 में भाजपा के विजेंद्र कुमार ‘नक्शे वाले’ ने पहली बार कमल खिलाया। नई सदी में बहुजन समाज पार्टी (BSP) का ग्राफ बढ़ा और धर्मपाल सिंह ने 2002 और 2007 में लगातार जीत दर्ज की। 2012 में कांग्रेस के गजराज सिंह ने एक बार फिर वापसी की।
मौजूदा समीकरण और वोटर गणित 2017 से हापुड़ सीट पर भाजपा का कब्जा है। विजयपाल आढ़ती ने 2017 में जीत हासिल की और 2022 में भी अपना परचम लहराया। 2022 के चुनाव में विजयपाल आढ़ती (97,862 वोट) का आरएलडी प्रत्याशी गजराज सिंह (90,828 वोट) के साथ कड़ा मुकाबला रहा, जिसमें आढ़ती ने 7,034 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हापुड़ विधानसभा में कुल 3,08,409 मतदाता हैं। इनमें 1,67,846 पुरुष और 1,40,550 महिला मतदाता हैं। जातीय समीकरणों की बात करें तो यहां लगभग 78-80% (2.40 से 2.50 लाख) हिंदू मतदाता हैं, जिनमें SC, जाट, वैश्य, ब्राह्मण, त्यागी, ठाकुर और सैनी शामिल हैं। वहीं, करीब 19-26% (60 से 80 हजार) मुस्लिम मतदाता और लगभग 4,000 सिख मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा: सपा की हैट्रिक के बाद BJP की वापसी
वर्ष 1962 में गठित गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा सीट शुरुआत में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। पहले चुनाव में बाबू वीर सेन विजयी हुए थे। 1967 और 1969 में निर्दलीय और फिर बीकेडी के टिकट पर बलबीर सिंह ने जीत दर्ज की। 70 और 80 के दशक में यह सीट कांग्रेस, लोकदल और जनता पार्टी के बीच झूलती रही।
1991 में इस सीट पर भाजपा के कृष्णवीर सिरोही ने पहली बार जीत दर्ज की और 1993 में भी इस सीट को बरकरार रखा। 1996 में भाजपा के रामनरेश रावत विधायक बने। 2002 में यहां समाजवादी पार्टी (SP) के मदन चौहान का दौर शुरू हुआ। चौहान ने 2002, 2007 और 2012 में लगातार तीन चुनाव जीतकर सपा की हैट्रिक लगाई।
हालांकि, 2017 में राजनीतिक समीकरण बदले और भाजपा के डॉ. कमल मलिक ने जीत हासिल की। 2022 के चुनाव में भी भाजपा का दबदबा कायम रहा, जब हरेंद्र सिंह तेवतिया ने सपा प्रत्याशी रविंद्र चौधरी को शिकस्त दी।
धौलाना विधानसभा: तीन चुनाव, तीन अलग पार्टियां और धर्मेश तोमर का प्रभाव
धौलाना विधानसभा सीट जिले की सबसे नई सीट है, जिसे पिलखुवा और धौलाना के भू-भाग को मिलाकर 2012 के परिसीमन में बनाया गया था। इससे पहले यह इलाका गाजियाबाद जिले की मोदीनगर विधानसभा का हिस्सा था।
2012 में हुए पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी के धर्मेश तोमर ने जीत हासिल की थी, जबकि बसपा के असलम चौधरी दूसरे स्थान पर रहे थे। 2017 के चुनाव में बसपा के असलम चौधरी ने भाजपा के कद्दावर नेता डॉ. रमेश चंद तोमर को कड़े मुकाबले में हरा दिया।
2022 के चुनाव में इस सीट पर फिर बड़ा राजनीतिक फेरबदल हुआ। धर्मेश सिंह तोमर ने इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। धौलाना सीट पर अब तक केवल तीन चुनाव हुए हैं, जिनमें से दो बार जनता ने धर्मेश सिंह तोमर को अपना प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा भेजा है।
