सिर्फ भारत ही नहीं पाकिस्तान पर भी उंगली उठा चुका है संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय

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पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर (PoK) में मानवाधिकारों के लगातार हो रहे हनन को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) की रिपोर्टों में गंभीर चिंताएं जाहिर की गई हैं। OHCHR की विस्तृत रिपोर्टों में इस क्षेत्र में जबरन गुमशुदगी, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियों और सैन्य हिरासत व्यवस्था को लेकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों और प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका पर बड़े सवाल उठाए गए हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानी की दृष्टि से महत्वपूर्ण इन दस्तावेजों में आज़ाद जम्मू-कश्मीर (AJK) और गिलगित-बाल्टिस्तान में संस्थागत भेदभाव और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाए जाने के मामलों को प्रमुखता से दर्ज किया गया है।

2018 और 2019 की रिपोर्ट: मानवाधिकार हनन का दस्तावेजीकरण

OHCHR ने 14 जून 2018 को कश्मीर की मानवाधिकार स्थिति पर अपनी पहली व्यापक रिपोर्ट जारी की थी। यह दस्तावेज इसलिए अहम था क्योंकि इसमें भारतीय-प्रशासित जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ पहली बार पाकिस्तान-प्रशासित क्षेत्रों की स्थिति को भी शामिल किया गया। रिपोर्ट में PoK में मानवाधिकार उल्लंघनों को ‘संरचनात्मक प्रकृति’ का बताया गया, जिसमें राजनीतिक अभिव्यक्ति, संगठन बनाने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और आतंकवाद-विरोधी कानूनों के दुरुपयोग जैसे मुद्दे शामिल थे।

इसके बाद, 8 जुलाई 2019 को OHCHR ने मई 2018 से अप्रैल 2019 तक की स्थिति पर एक अपडेटेड रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट का सबसे संवेदनशील हिस्सा पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर में ‘जबरन गुमशुदगी’ (Forced Disappearances) के निष्कर्षों से जुड़ा था।

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों पर गुमशुदगी के आरोप

2019 की रिपोर्ट के अनुच्छेद 174 में OHCHR ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि उसके संज्ञान में आए लगभग सभी गुमशुदगी के मामलों में पीड़ित समूहों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराया। रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई कि PoK से गायब किए गए लोगों को पाकिस्तान में सेना द्वारा संचालित हिरासत केंद्रों (Military Detention Centers) में रखा गया हो सकता है।

हालांकि OHCHR ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्र में स्वतंत्र पहुंच न होने के कारण वह सभी आरोपों की प्रत्यक्ष पुष्टि नहीं कर सका, लेकिन अंतरराष्ट्रीय पटल पर पीड़ित समूहों के इन आरोपों को दर्ज करना अपने आप में एक बड़ा कदम था।

सैन्य हिरासत और कठोर कानूनों पर सवाल

मानवाधिकार रिपोर्ट में पाकिस्तान की सैन्य हिरासत व्यवस्था और ‘एक्शंस (इन एड ऑफ सिविल पावर) रेगुलेशन, 2011’ को लेकर भी चिंता जताई गई है। OHCHR ने संयुक्त राष्ट्र की यातना-विरोधी समिति (Committee against Torture) की उन टिप्पणियों का भी हवाला दिया है, जिसमें पाकिस्तानी सेना को बिना आरोप तय किए या बिना किसी न्यायिक निगरानी के संदिग्धों को हिरासत में रखने की व्यापक शक्तियां दिए जाने पर आपत्ति जताई गई थी। समिति ने इस तरह की गुप्त या संपर्क-विहीन हिरासत को समाप्त करने की सिफारिश की थी।

राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर दबाव और पाबंदियां

रिपोर्ट के अनुसार, आज़ाद जम्मू-कश्मीर (AJK) और गिलगित-बाल्टिस्तान में ऐसे सख्त कानूनी प्रावधान लागू हैं जो पाकिस्तान के साथ क्षेत्र के विलय या उसकी राजनीतिक विचारधारा का विरोध करने वालों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।

OHCHR ने अपनी जांच में पाया:

  • स्वतंत्रता समर्थक और राष्ट्रवादी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लगातार धमकियां दी जा रही हैं।

  • शांतिपूर्ण सभा, संगठन बनाने और विचार व्यक्त करने के अधिकारों पर सीमाएं थोपी गई हैं।

  • AJK के अंतरिम संविधान में 2018 के संशोधन के बावजूद ऐसे प्रावधान बरकरार रखे गए, जो पाकिस्तान के साथ विलय की विचारधारा के विरोध को अपराध बनाते हैं। इन प्रावधानों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विपरीत माना गया है।

स्वतंत्र जांच और सूचना तक पहुंच में बाधा

OHCHR ने अपनी रिपोर्ट के अनुच्छेद 49 और 50 में स्पष्ट किया है कि उसे इस क्षेत्र में आवश्यक और स्वतंत्र पहुंच नहीं मिली। कार्यालय के अनुसार, पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर में अभिव्यक्ति और संगठन बनाने की स्वतंत्रता पर भारी प्रतिबंधों के कारण मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और पर्यवेक्षकों का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। स्वतंत्र मीडिया के काम करने पर लगी पाबंदियों के कारण क्षेत्र से मानवाधिकार उल्लंघनों की पूरी और सटीक जानकारी जुटाना संयुक्त राष्ट्र के लिए भी एक बड़ी चुनौती रही है।