दिल्ली दंगों और जामिया हिंसा की SIT जांच की मांग खारिज, नेताओं पर भी नहीं होगी FIR
राजधानी दिल्ली को झकझोर देने वाले 2020 के दंगों और 2019 की जामिया नगर हिंसा को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा और निर्णायक फैसला सुनाया है। अदालत ने इन घटनाओं की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग वाली सभी याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है।
इसके साथ ही, कोर्ट ने उन अर्जियों को भी रद्द कर दिया है, जिनमें कुछ राजनीतिक नेताओं पर कथित भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग की गई थी। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब इस मामले में किसी नई या स्वतंत्र जांच एजेंसी के गठन की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है।
याचिकाकर्ताओं की मांग: पुलिस पर उठे थे सवाल
दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष दाखिल इन याचिकाओं में दिल्ली पुलिस की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि:
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दिल्ली पुलिस की अब तक की कार्रवाई निष्पक्ष नहीं रही है, इसलिए पूरे मामले की स्वतंत्र जांच (SIT) कराई जाए।
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कथित रूप से भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं (जैसे कपिल मिश्रा और प्रवेश वर्मा) के खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज हो।
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ड्यूटी में लापरवाही बरतने वाले और पक्षपात करने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
हालांकि, अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि SIT बनाने या मौजूदा जांच प्रक्रिया में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता है।
क्या हुआ था 2020 के दिल्ली दंगों में?
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के समर्थकों और विरोधियों के बीच तनाव ने भीषण सांप्रदायिक दंगों का रूप ले लिया था। जाफराबाद और मौजपुर से शुरू हुई यह हिंसा कई दिनों तक चली थी।
सड़कों पर हुए पथराव, पेट्रोल बम हमलों और आगजनी में खुफिया ब्यूरो (IB) के कर्मचारी अंकित शर्मा सहित 53 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस दौरान करोड़ों रुपये की निजी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था।
2019 का जामिया हिंसा विवाद
याचिकाओं में दिसंबर 2019 की जामिया मिलिया इस्लामिया हिंसा का भी जिक्र था। CAA के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों के दौरान 15 दिसंबर को जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की तरफ मार्च करने की कोशिश की, तो हालात हिंसक हो गए।
मथुरा रोड के पास बैरिकेडिंग रोकने पर भड़की भीड़ ने बसों और निजी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया था। स्थिति पर काबू पाने के लिए दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। इस दौरान पुलिस जामिया यूनिवर्सिटी कैंपस और लाइब्रेरी के भीतर तक दाखिल हो गई थी, जिसे लेकर देशभर में भारी विवाद हुआ था।
हाई कोर्ट के फैसले के क्या हैं मायने?
दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि दंगों और हिंसा से जुड़े मामलों की जांच मौजूदा प्रक्रिया और एजेंसियों के जरिए ही आगे बढ़ेगी। अदालत ने पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग को भी राहत देने लायक नहीं माना। इस फैसले से जहां दिल्ली पुलिस को बड़ी राहत मिली है, वहीं भड़काऊ बयानों के आधार पर नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज कराने की उम्मीद लगाए बैठे पक्षकारों को गहरा झटका लगा है।
