SC-ST Act Misuse Allegations: गांव में बढ़ती सामाजिक खाई पर NCP नेता हरिश्चंद्र सिंह की चिंता

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अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC-ST Act) दलित और आदिवासी समुदायों को जाति आधारित अत्याचार से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया एक अहम हथियार है। लेकिन, इसके दुरुपयोग के मामलों को लेकर एनसीपी (अजित पवार गुट) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष हरिश्चंद्र सिंह ने गहरी चिंता व्यक्त की है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह कानून सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए है, लेकिन जब निजी दुश्मनी या जमीन-जायदाद के विवादों में इसका गलत इस्तेमाल होता है, तो इससे ग्रामीण भारत का सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह प्रभावित होता है।

गांवों में निजी विवाद बन रहे जातीय तनाव का कारण

हरिश्चंद्र सिंह ने कहा कि खासतौर पर गांव-देहात में जमीन, मेड़, रास्ते, पानी, खेत-खलिहान या लेन-देन से जुड़े साधारण पारिवारिक विवाद अक्सर वर्षों तक चलते हैं। जब इन व्यक्तिगत विवादों में ‘जातीय उत्पीड़न’ के आरोप जोड़ दिए जाते हैं, तो यह सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं रह जाती।

उनके मुताबिक, “ऐसे मामलों में पूरे गांव के सामाजिक संबंध प्रभावित होते हैं, दो पक्षों के बीच अविश्वास बढ़ता है और समुदायों के बीच लंबे समय तक सामाजिक दूरी बनी रह जाती है।” उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में निजी विवादों को जानबूझकर जातीय अपराध का रंग देकर मुकदमेबाजी की जाती है, जिससे आरोपी परिवार पर भारी कानूनी और आर्थिक दबाव पड़ता है।

क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े?

सरकारी आंकड़ों (NCRB) के अनुसार, SC-ST एक्ट के तहत दर्ज मामलों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया है:

  • 2020: 45,995 मामले दर्ज हुए।

  • 2022: 52,866 मामले दर्ज हुए।

  • 2023: 53,372 मामले दर्ज हुए।

  • 2024: दर्ज मामलों की संख्या घटकर 48,669 रह गई, लेकिन 2,87,694 मामले ट्रायल में लंबित थे।

  • दोषसिद्धि (Conviction): 2024 में इस कानून के तहत सजा पाने वालों की संख्या 10,839 रही, जो 2020 (4,855) के मुकाबले काफी अधिक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दर्ज मामलों की संख्या बढ़ने या कम दोषसिद्धि (Low Conviction Rate) दर से यह साबित नहीं होता कि सभी मामले झूठे हैं। सबूतों की कमी, गवाहों के मुकरने या जांच की खामियों के कारण भी केस अदालत में टिक नहीं पाते।

सुप्रीम कोर्ट की अहम कानूनी कसौटी

सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर SC-ST Act के प्रयोग को लेकर स्थिति स्पष्ट की है:

  • किसी भी व्यक्ति का अनुसूचित जाति/जनजाति से होना ही अपने आप में हर विवाद को SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बना देता।

  • कानून की धाराएं तभी लागू होती हैं जब जाति के आधार पर जानबूझकर अपमान किया गया हो या घटना ‘सार्वजनिक दृष्टि’ (Public View) में हुई हो।

  • सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में (सितंबर 2026) इस कानून की संवैधानिक वैधता और 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए प्रावधानों में बदलाव करने से इनकार कर दिया था।

‘सामाजिक न्याय और सद्भाव विरोधी नहीं’

हरिश्चंद्र सिंह ने जोर देकर कहा कि वास्तविक अत्याचार के मामलों में पीड़ित को तत्काल सुरक्षा और न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन इसके साथ ही पुलिस की जांच पूरी तरह निष्पक्ष और तथ्यपरक होनी चाहिए, ताकि निर्दोष लोगों को केवल आरोपों के आधार पर उत्पीड़न का शिकार न होना पड़े।

उन्होंने कहा कि “सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कानून तभी प्रभावी होगा जब वह वास्तविक पीड़ित को न्याय दिलाए, दोषी को सजा दे और निर्दोष को फंसाए जाने से बचाए।” इस दोहरी चुनौती से निपटने के लिए पुलिस-प्रशासन और समाज को मिलकर काम करने की जरूरत है।