यमन का भीषण जल संकट: इतिहास के पहले ‘बिना पानी वाले देश’ बनने की कगार पर
मध्य पूर्व का देश यमन वर्तमान में दुनिया के सबसे गंभीर और खामोश मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है। भूजल भंडार इतनी तेजी से समाप्त हो रहे हैं कि वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय संगठन यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो यमन इस्तेमाल लायक भूजल पूरी तरह खोने वाला दुनिया का पहला देश बन सकता है। यह महज कुछ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि वहां के नागरिकों, किसानों और पूरे शहरों के अस्तित्व की लड़ाई है।
प्राकृतिक नदियों का अभाव और भूजल पर निर्भरता
यमन की सबसे बड़ी भौगोलिक चुनौती यह है कि इस देश में एक भी बारहमासी (स्थायी) नदी नहीं है। सदियों से यह देश अनियमित बारिश और जमीन के नीचे सदियों से जमा भूजल पर निर्भर रहा है। जब बारिश कम होती है, तो दैनिक जरूरतें और कृषि पूरी तरह भूजल पर टिक जाती हैं। एक बार ये भूमिगत भंडार खत्म हो जाएं, तो इन्हें प्राकृतिक रूप से भरने में दशकों या सदियां लग सकती हैं।
बे तहाशा दोहन और गहरे होते कुएं
यमन में पानी निकाले जाने की रफ्तार बारिश द्वारा उसे वापस भरने की क्षमता से कई गुना अधिक है। कुछ क्षेत्रों में जल स्तर हर साल 6 मीटर तक गिर रहा है। पानी की तलाश में लोग मजबूरन 800 मीटर से ज्यादा गहरे कुएं खोद रहे हैं। यह एक खतरनाक चक्र बन चुका है—कम गहरे स्रोत सूखते हैं, लोग और गहरे जाते हैं, लागत बढ़ती है और पानी और अधिक दूर हो जाता है।
संकट को बढ़ाने वाले मुख्य कारण
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काट (Khat) की खेती: यमन की पारंपरिक नकदी फसल ‘काट’ के पत्तों को उत्तेजक रूप में चबाया जाता है, लेकिन इसकी भारी कीमत पानी से चुकानी पड़ रही है। अनुमान है कि देश के कुल कृषि जल का 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ इसी फसल की सिंचाई में खर्च हो जाता है।
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युद्ध से टूटा बुनियादी ढांचा: साल 2015 से जारी गृहयुद्ध ने जल संकट को कई गुना बढ़ा दिया है। पंपिंग स्टेशन, पाइपलाइन और जल शोधन संयंत्र क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। बिजली और ईंधन की भारी किल्लत ने बचे-कुचे पंपों को चलाना भी मुश्किल कर दिया है।
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जलवायु परिवर्तन: बढ़ते तापमान के कारण सूखे की अवधि लंबी हो गई है और बारिश का पैटर्न पूरी तरह अनिश्चित हो गया है। जब बारिश होती है, तो वह बाढ़ का रूप ले लेती है जिससे पानी जमीन में रिसने के बजाय बह जाता है।
आंकड़ों से बयां होती भयावहता
अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार, यदि किसी देश में प्रति व्यक्ति नवीकरणीय पानी की उपलब्धता 1,000 क्यूबिक मीटर सालाना से कम हो जाए, तो उसे जल संकट से ग्रस्त माना जाता है। यमन में यह आंकड़ा गिरकर मात्र 100 से 150 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति रह गया है।
राजधानी सना सहित देश के विभिन्न इलाकों में महिलाएं और बच्चे पानी की एक-एक बूंद के लिए मीलों दूर पैदल चलने को विवश हैं। यदि समय रहते अंतरराष्ट्रीय सहयोग, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और जल प्रबंधन के कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी आपदा का रूप ले लेगा।
