September 15, 2026

UP में गुंडा एक्ट के इस्तेमाल पर क्यों नाराज हुआ हाई कोर्ट? सरकार को फटकार

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में ‘गुंडा एक्ट’ (Goonda Act) के कथित तौर पर गलत इस्तेमाल को लेकर राज्य सरकार और प्रशासन की कड़ी आलोचना की है। लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक मामले की सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की कि अदालत के सामने आ रहे मामलों से ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकार इस कड़े कानून का इस्तेमाल कर लोगों को महज परेशान करने पर आमादा है।

जस्टिस विद्यार्थी ने स्पष्ट किया कि गुंडा एक्ट एक ‘बहुत ताकतवर’ (Draconian) कानून है और इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी के साथ, सिर्फ स्पष्ट मामलों में और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए।

गोंडा DM और कमिश्नर के आदेश रद्द

हाई कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी गोंडा के एक मामले में की है। अदालत ने गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट (DM) द्वारा जाहिद अली नामक व्यक्ति को ‘गुंडा’ घोषित करने और उसे 6 महीने के लिए जिले से बाहर (तड़ीपार) निकालने के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने डिविजनल कमिश्नर के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें डीएम के फैसले को सही ठहराया गया था।

क्या था पूरा मामला और कोर्ट ने क्या खामियां पाईं?

गोंडा के डीएम ने 11 मई, 2026 को गुंडा एक्ट की धारा 3(1) के तहत जाहिद अली के खिलाफ आदेश जारी किया था। यह कार्रवाई दो आपराधिक मामलों (2010 और 2020) और एक पुलिस बीट सूचना रिपोर्ट के आधार पर की गई थी।

इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई में कई गंभीर खामियां उजागर कीं:

  • बरी हो चुके मामले को बनाया आधार: कोर्ट ने पाया कि 2010 के जिस मामले का जिक्र किया गया है, उसमें गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट 26 अगस्त 2017 को ही जाहिद अली को बरी कर चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि जिस मामले में कोई शख्स बरी हो चुका हो, उसे गुंडा घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

  • छह साल का लंबा अंतर: कोर्ट ने टिप्पणी की कि 2020 के आपराधिक मामले और 2026 में जारी आदेश के बीच करीब 6 साल का अंतर है। इन दोनों के बीच कोई तार्किक संबंध (Logical Nexus) साबित नहीं होता।

  • एक मामला आदतन अपराधी नहीं बनाता: अदालत ने कहा कि साल 2020 के केवल एक आपराधिक मामले में शामिल होने भर से यह साबित नहीं होता कि अली आदतन अपराधी है या वह अपराध के लिए उकसाता है।

  • बीट इन्फॉर्मेशन पर सवाल: बेंच ने पुलिस की ‘बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट’ को भी कार्रवाई का सही आधार मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस जानकारी के आधार पर न तो कोई केस दर्ज हुआ और न ही अली को अपनी बात रखने का मौका मिला। ऐसे में इसे आधार बनाना ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।

पुलिस रिपोर्ट में पेश की गई गलत तस्वीर

हाई कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट में उस मामले का जिक्र किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई जिसमें याचिकाकर्ता पहले ही बरी हो चुका था। अदालत ने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि डीएम के सामने याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश की गई। साथ ही, कमिश्नर द्वारा बरी हो चुके मामले को भी ‘लंबित’ मान लेना यह दर्शाता है कि अधिकारियों ने अपने विवेक का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया।