केवल शीर्ष अदालत के पास ही आपराधिक जांच और FIR का आदेश देने का अधिकार
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों और उससे जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू करने के लिए एफआईआर (FIR) दर्ज कराने का आदेश देने का विशेष अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के पास है। किसी भी जांच समिति या अन्य संस्था को इस संबंध में अपनी तरफ से निर्देश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने इसी संदर्भ में अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।
5 सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) का गठन इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) का गठन किया है। अदालत ने समिति की भूमिका और उसकी शक्तियों को स्पष्ट करते हुए कहा कि:
-
HPEC को मामले से जुड़े आरोपों की जांच करने, प्रभावित या पीड़ित लोगों की पहचान करने और जांच के आधार पर अपनी सिफारिशें अदालत के सामने रखने का पूरा अधिकार है।
-
हालांकि, यह समिति अपनी ओर से किसी भी आपराधिक जांच को आगे बढ़ाने के लिए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकती। ऐसा आदेश देने का अधिकार केवल न्यायालय के पास सुरक्षित है।
पुलिस कार्रवाई और 1 सितंबर का आदेश दिल्ली पुलिस की ओर से CJP आंदोलन से जुड़े 13 मामलों को वापस लेने और प्रदर्शन के दौरान मौजूद करीब 2,873 लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच को लेकर याचिका दायर की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पहले भी साफ किया था कि प्रदर्शनकारियों को दी गई राहत का मतलब यह नहीं है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में शामिल लोगों को स्वतः संरक्षण मिल जाएगा।
इससे पहले 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया था कि 20 से 25 जुलाई के दौरान हुए प्रदर्शनों को लेकर दर्ज एफआईआर में आगे कोई जांच या कार्रवाई नहीं की जाएगी और इन मामलों को बंद माना जाएगा। अदालत ने दोहराया है कि एफआईआर से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय केवल न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही लिए जाएंगे और कोई बाहरी संस्था इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
