फर्जी पासपोर्ट मामला: पतंजलि के एमडी आचार्य बालकृष्ण सभी आरोपों से बरी
देहरादून की तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीबीआई) अदालत ने पतंजलि आयुर्वेद के मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य बालकृष्ण को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट बनवाने के मामले में बरी कर दिया है। अदालत ने करीब डेढ़ दशक तक चले इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए बालकृष्ण को उनके खिलाफ लगाई गई सभी धाराओं और आरोपों से मुक्त कर दिया है।
2011 में सामने आया था नागरिकता और पासपोर्ट का विवाद यह पूरा मामला अप्रैल 2011 में एक शिकायत के बाद शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आचार्य बालकृष्ण मूल रूप से नेपाल के नागरिक हैं और उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर भारतीय पासपोर्ट हासिल किया है। इसके बाद सीबीआई (CBI) ने जून 2011 में मामले की प्रारंभिक जांच (PE) दर्ज की और अगले ही महीने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी।
फर्जी डिग्री और धोखाधड़ी के आरोप सीबीआई की जांच बरेली पासपोर्ट कार्यालय में जमा किए गए शैक्षणिक दस्तावेजों पर केंद्रित थी। एजेंसी का आरोप था कि बालकृष्ण ने जो प्रमाणपत्र लगाए थे, वे फर्जी थे। ये दस्तावेज उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले (खुर्जा) स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय के नाम से जारी हुए थे, जो वाराणसी के सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध था।
एफआईआर में आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ आपराधिक साजिश (IPC 120-B), धोखाधड़ी (420), फर्जी दस्तावेज तैयार करने (468) और उनके इस्तेमाल (471) के साथ-साथ पासपोर्ट अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। जांच में शिक्षण संस्थान के पूर्व प्रिंसिपल नरेश चंद द्विवेदी को भी आरोपी बनाते हुए चार्जशीट दाखिल की गई थी।
गैर-जमानती वारंट और एक महीने की जेल शुरुआत में जुलाई 2011 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें अपना पासपोर्ट कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया था। हालांकि, जुलाई 2012 में सीबीआई द्वारा स्पेशल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने के बाद बालकृष्ण अदालत में पेश नहीं हुए।
कोर्ट से गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी होने के बाद सीबीआई ने 20 जुलाई 2012 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें देहरादून की सुद्धोवाला जेल में रखा गया। करीब एक महीने जेल में रहने के बाद अगस्त 2012 में हाईकोर्ट ने उन्हें सशर्त जमानत दी।
ट्रायल और आरोपों से मुक्ति कानूनी प्रक्रिया के तहत अक्टूबर 2013 में अदालत ने बालकृष्ण के खिलाफ आरोप तय किए। हालांकि, अगस्त 2014 में सेशन कोर्ट के आदेश पर आरोपों में संशोधन हुआ और मामले का ट्रायल मुख्य रूप से आईपीसी की धारा 471 और पासपोर्ट एक्ट की धारा 12(1)(B) के तहत चला।
साल 2018 में बालकृष्ण को हाईकोर्ट से अपना पासपोर्ट वापस लेने और उसे रिन्यू कराने की अनुमति मिल गई थी। अब देहरादून की तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद आचार्य बालकृष्ण को इस मामले में पूरी तरह से दोषमुक्त करार दिया है।
