September 15, 2026

परिसीमन पर खरगे का PM मोदी को पत्र, ऑल-पार्टी मीटिंग बुलाने की मांग

pm-modi-speech

नई दिल्ली: देश में परिसीमन (Delimitation) के प्रस्ताव और संसद के सत्रावसान (Prorogation) में हो रही देरी को लेकर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि सरकार के पास परिसीमन को लेकर जो भी प्रस्ताव हैं, उन पर खुलकर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक (All-Party Meeting) बुलाई जाए। उन्होंने सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि इस बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर किसी भी तरह की जल्दबाजी से बचा जाना चाहिए।

डिटेल स्टडी के लिए समय की मांग

कांग्रेस अध्यक्ष ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी चिट्ठी साझा करते हुए कहा कि उन्होंने पहले भी 16 जुलाई 2026 को इस संबंध में पत्र लिखा था। खरगे ने कहा, “यदि सरकार संसद के किसी विशेष सत्र में परिसीमन का प्रस्ताव पेश करने की सोच रही है, तो उससे पहले सभी राजनीतिक दलों को इस प्रस्ताव की विस्तृत अध्ययन (Detail Study) के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।”

उन्होंने केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के उस हालिया बयान का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने विशेष सत्र बुलाए जाने के संकेत दिए थे। खरगे का मानना है कि शायद इसी संभावित विशेष सत्र के कारण ही मानसून सत्र के औपचारिक सत्रावसान में लगातार देरी की जा रही है।

कांग्रेस पार्टी की मुख्य मांगें:

  • सीटों का यथास्थिति बनाए रखना: कांग्रेस का स्पष्ट रुख है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या और राज्य-वार सीटों के आवंटन को अगले 25 सालों तक यानी यथावत बनाए रखा जाए।

  • महिला आरक्षण लागू करना: पार्टी की मांग है कि साल 2029 के लोकसभा चुनावों से ही महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) आरक्षण को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।

विवाद और पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि इसी साल 17 अप्रैल को लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया था, लेकिन दो-तिहाई बहुमत (Special Majority) न मिल पाने के कारण यह पारित नहीं हो सका था। उस दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे।

परिसीमन के मुद्दे पर विपक्ष लगातार यह आशंका जता रहा है कि इससे जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों (विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों) के साथ सीटों के निर्धारण में भेदभाव हो सकता है। हालांकि, सरकार की ओर से लगातार यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि परिसीमन प्रक्रिया से किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।