एक राष्ट्र, एक चुनाव पर चिदंबरम का बड़ा हमला, बोले- प्रस्ताव असंवैधानिक, सदनों का कार्यकाल घटाना मूल ढांचे का उल्लंघन
नई दिल्ली: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का संसद की संयुक्त समिति के सामने कड़ा विरोध किया है। उन्होंने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की व्यवस्था को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि यह बिना पर्याप्त विचार के उठाया गया कदम है। चिदंबरम ने संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्तावों पर अपनी आपत्तियां समिति के सामने रखीं।
सदनों का कार्यकाल घटाने पर उठाए सवाल
चिदंबरम ने समिति के सामने दलील दी कि प्रत्येक विधानमंडल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और इसे कम करना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होगा। उन्होंने कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इन विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती। कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि सरकार के पास इन विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं है।
सागरिका घोष ने भी किया विरोध
संसदीय समिति की सदस्य और तृणमूल कांग्रेस की नेता सागरिका घोष ने भी प्रस्तावित विधेयकों का विरोध किया। उन्होंने आशंका जताई कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था से निर्वाचन आयोग को अत्यधिक अधिकार मिल सकते हैं। वहीं, करीब 10 पद्म पुरस्कार से सम्मानित लोगों के एक समूह ने भी समिति के सामने अपनी राय रखी। इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार शामिल थे। कुछ सदस्यों ने एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया, जबकि कुछ ने इसके विरोध में देश में अराजकता पैदा होने की आशंका जताई।
दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश हुए थे विधेयक
एक राष्ट्र, एक चुनाव से जुड़े संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। इसके बाद दोनों विधेयकों को विचार के लिए संसद की संयुक्त समिति के पास भेजा गया। इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। इस समिति ने चरणबद्ध तरीके से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी इस उच्चस्तरीय समिति के सदस्य थे।
1951 से 1967 तक साथ हुए थे चुनाव
देश में संविधान लागू होने के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते रहे। पहला आम चुनाव 1951-52 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ हुआ था। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में भी यह व्यवस्था जारी रही।
समय से पहले सदन भंग होने से टूटा चुनाव चक्र
कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण 1968 और 1969 में एक साथ चुनाव कराने का चक्र बाधित हो गया। इसके बाद चौथी लोकसभा को भी 1970 में समय से पहले भंग कर दिया गया और 1971 में नए चुनाव हुए। पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल आपातकाल के दौरान संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ाया गया था।
इसके बाद भी कई लोकसभाएं अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं। छठी, सातवीं, नौवीं, 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा को समय से पहले भंग किया गया, जबकि आठवीं, दसवीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। राज्य विधानसभाओं में भी समय से पहले भंग होने और कार्यकाल बढ़ाए जाने की घटनाएं सामने आती रहीं। इसी वजह से लोकसभा और विधानसभा चुनावों का चक्र अलग-अलग हो गया और देश में विभिन्न समय पर चुनाव होने लगे।
