चुनाव आयोग में मतभेद की रिपोर्ट पर अशोक लवासा बोले- SIR बंद हो, तथ्य सामने आएं

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Election Commission Row: चुनाव आयोग को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने सियासी बहस तेज कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कुछ फैसलों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई है।

इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा से जुड़े सिस्टम जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन खबरों के बाद कहा है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि आंतरिक तौर पर अलग-अलग राय, सुझाव और सवाल उठना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।

इसी विवाद के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी अपनी बात रखी है। उन्होंने SIR को रोकने और आयोग से पूरे मामले पर स्थिति साफ करने की बात कही है।

Form 6 में बदलाव पर क्या है विवाद?

अशोक लवासा के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों ने कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं जो सीधे कानूनी प्रक्रिया से जुड़े हैं।

मामला वोटर बनने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 से भी जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें SIR से संबंधित जानकारी मांगी जाने लगी है। नए मतदाताओं से पूछा जा रहा है कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की वोटर लिस्ट में था या नहीं।

लवासा का सवाल है कि अगर कानून में तय फॉर्म में बदलाव किया गया है, तो यह बदलाव किस प्रक्रिया के तहत हुआ?

उनका कहना है कि अगर Electoral Registration Officer यानी ERO की कानूनी शक्तियां किसी तकनीकी व्यवस्था की वजह से प्रभावित हो रही हैं, तो यह गंभीर मुद्दा है।

गोवा के मामले का भी दिया उदाहरण

अशोक लवासा ने गोवा के एक मामले का जिक्र किया। उनके मुताबिक, वहां कुछ लोगों को ERO ने वोटर लिस्ट में शामिल करने के योग्य माना था, लेकिन सॉफ्टवेयर के स्तर पर ऐसा नहीं हो सका।

Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 ऐसे लोगों का मामला सामने आया जिन्हें ग्राउंड लेवल पर ERO ने योग्य पाया था, लेकिन सॉफ्टवेयर के जरिए उनके नाम जोड़ने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

लवासा के मुताबिक, तकनीक सिर्फ एक माध्यम है। इससे कानून के तहत ERO को मिली शक्तियां खत्म नहीं होनी चाहिए।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति पर क्या बोले लवासा?

चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संस्था है। कानून के मुताबिक, कोशिश रहती है कि फैसले सर्वसम्मति से लिए जाएं। अगर ऐसा संभव नहीं हो तो बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाता है।

लवासा ने इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि अगर दो चुनाव आयुक्त किसी फैसले पर आपत्ति जता रहे हैं, तो यह समझना जरूरी है कि उनकी आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई।

उनका कहना है कि पूरे मामले को रिकॉर्ड और प्रक्रिया के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए।

SIR को लेकर लवासा की राय

अशोक लवासा ने मौजूदा विवाद के बीच SIR को खत्म करने की बात कही है।

उनके मुताबिक, चुनाव आयोग को इस पूरे मामले की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। अगर चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां सही नहीं हैं, तो आयोग को दस्तावेजों और रिकॉर्ड के जरिए यह बात साफ करनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि मामले की तह तक जाना जरूरी है। यह देखना होगा कि कहीं किसी कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन तो नहीं हुआ।

कोर्ट में अब कौन सा सवाल अहम?

लवासा के मुताबिक, अब तक अदालत के सामने मुख्य सवाल यह रहा है कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने की संवैधानिक शक्ति है या नहीं।

लेकिन उनके मुताबिक, इसके बाद एक और सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। वह है SIR लागू करने के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया और उससे जुड़े कानूनी पहलू।

यानी बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि SIR कराया जा सकता है या नहीं। यह भी देखना होगा कि इसे लागू करने का तरीका कानून के मुताबिक था या नहीं।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

इस पूरे विवाद पर चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके सभी आधिकारिक आदेश और फैसले कानूनी आधार पर लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अलग-अलग राय, लिखित टिप्पणियां और आंतरिक सवाल किसी संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं।

इसलिए फिलहाल विवाद के दो पहलू सामने हैं। एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर रिपोर्ट सामने आई है। दूसरी तरफ आयोग ने कहा है कि SIR समेत उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।