CEC नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट का बंटा फैसला, अब संविधान पीठ करेगी सुनवाई
CEC EC Appointment Law 2023: मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा घटनाक्रम हुआ है।
इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी बेंच के पास भेजा जाए या नहीं, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की राय अलग-अलग रही। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इस मुद्दे पर अलग राय दी।
इसके बाद मामला बड़ी बेंच के गठन के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने रखने का रास्ता साफ हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक अब पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले को देख सकती है।
किस बात को लेकर है पूरा विवाद?
विवाद 2023 में बनाए गए उस कानून को लेकर है, जिसमें CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति बनाई गई है।
इस समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं।
इस व्यवस्था में पहले वाले चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI को हटा दिया गया था। यही बदलाव अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के केंद्र में है।
जस्टिस दत्ता ने क्या कहा?
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले को पांच जजों की बेंच के पास भेजने की केंद्र की मांग से सहमति नहीं जताई।
सुनवाई के दौरान उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए। उनकी टिप्पणी का मुख्य आधार यह था कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से नामित मंत्री होने से कार्यपालिका की भूमिका काफी मजबूत हो जाती है।
जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सिर्फ कागज पर नहीं दिखनी चाहिए, बल्कि जनता को भी उसकी स्वतंत्रता का भरोसा होना चाहिए।
जस्टिस शर्मा की राय अलग रही
दूसरी तरफ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने के पक्ष में राय दी।
इस तरह दोनों जजों की राय अलग हो गई। हालांकि, दोनों इस बात पर सहमत रहे कि मामला प्रशासनिक स्तर पर CJI के सामने रखा जाए, ताकि उचित संख्या वाली बेंच के गठन पर फैसला हो सके।
2023 में क्या हुआ था?
इस पूरे विवाद की शुरुआत 2023 के एक अहम सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ी है।
मार्च 2023 में पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि जब तक संसद CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति के लिए एक समिति की व्यवस्था रहेगी।
इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI को शामिल किया गया था। यह व्यवस्था संसद की ओर से कानून बनाए जाने तक लागू रहने वाली थी।
फिर संसद ने बनाया नया कानून
इसके बाद अगस्त 2023 में केंद्र सरकार ने नया विधेयक पेश किया।
इसमें चयन समिति से CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान रखा गया।
संसद से विधेयक पास होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई। इसके बाद जनवरी 2024 में इस कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
फिलहाल दो जजों की बेंच ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दी है। आगे की सुनवाई बड़ी बेंच में होगी और वही इस कानून की वैधता से जुड़े सवालों पर फैसला करेगी।
